UNEP की Limiting Overshoot रिपोर्ट: 1.5°C की सीमा पार होने के बाद दुनिया के सामने क्या विकल्प हैं?
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने 2 सितंबर 2026 को अपनी नई रिपोर्ट “Limiting Overshoot – Navigating exceedance of 1.5°C and pathways towards return” जारी की है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब वैश्विक तापमान (Global Temperature) के आने वाले वर्षों में औद्योगिक-पूर्व स्तर (Pre-industrial Level) से 1.5°C अधिक होने की संभावना लगातार बढ़ रही है。
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि 1.5°C की सीमा पार होना जलवायु संकट (Climate Crisis) का अंत नहीं है। अब दुनिया के सामने चुनौती यह है कि तापमान कितनी अधिक ऊंचाई तक जाता है, कितने समय तक उस स्तर पर रहता है और क्या भविष्य में उसे फिर कम किया जा सकता है। UNEP ने इसके लिए “Overshoot, Peak and Decline” का रास्ता सामने रखा है।
क्या है Climate Overshoot?
Climate Overshoot का अर्थ उस स्थिति से है जब वैश्विक औसत तापमान 1.5°C की सीमा को कुछ समय के लिए पार कर जाता है और बाद में तापमान को कम करके फिर उस सीमा के आसपास या नीचे लाने का प्रयास किया जाता है।
UNEP के अनुसार Overshoot को केवल एक घटना या एक निश्चित वर्ष के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह एक लंबी प्रक्रिया (Pathway) है, जिसमें तापमान पहले 1.5°C से ऊपर जाता है, फिर एक अधिकतम स्तर (Peak) तक पहुंचता है और उसके बाद धीरे-धीरे नीचे आने की कोशिश की जाती है।
इसलिए आने वाले वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होगा कि 1.5°C की सीमा पार होगी या नहीं, बल्कि यह होगा कि यह सीमा कितनी अधिक पार होगी और कितने समय तक पार रहेगी।
1.5°C का लक्ष्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
पेरिस समझौते (Paris Agreement) - 2015 के तहत दुनिया ने वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक-पूर्व स्तर की तुलना में 2°C से काफी नीचे रखने और 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास करने का लक्ष्य निर्धारित किया था।
1.5°C कोई ऐसी सीमा नहीं है जिसके नीचे जलवायु पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। इसके आसपास भी अत्यधिक गर्मी, सूखा, बाढ़, जंगलों में आग, ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्र-स्तर बढ़ने जैसी समस्याएं दिखाई दे रही हैं।
लेकिन तापमान के प्रत्येक अतिरिक्त अंश के साथ जोखिम बढ़ता जाता है। UNEP के अनुसार 1.5°C से ऊपर जाने पर जलवायु संबंधी प्रभाव (Climate Impacts) अधिक गंभीर और कई मामलों में परस्पर जुड़े हुए हो सकते हैं। इससे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem), खाद्य सुरक्षा (Food Security), जल संसाधन (Water Resources), स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
दुनिया 1.5°C की सीमा कब पार कर सकती है?
UNEP की नई रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक तापमान के अगले कुछ वर्षों में 1.5°C से ऊपर जाने की संभावना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पेरिस समझौते का लक्ष्य तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त हो जाएगा, बल्कि यह संकेत है कि दुनिया को अब एक ऐसे भविष्य के लिए भी तैयार होना होगा जिसमें तापमान कुछ समय के लिए 1.5°C से ऊपर रह सकता है।
UNEP की एक व्याख्यात्मक रिपोर्ट के अनुसार यदि वर्तमान जलवायु नीतियों और प्रतिबद्धताओं को लागू किया जाता है, तो वार्मिंग का स्तर कम-से-कम लगभग 1.8°C तक पहुंचने का अनुमान है। इसलिए वर्तमान प्रयासों को और तेज करने की आवश्यकता है।
UNEP का “Overshoot, Peak and Decline” रास्ता क्या है?
UNEP ने वर्तमान परिस्थितियों से निपटने के लिए तीन प्रमुख चरणों वाले रास्ते पर जोर दिया है:
- ➤ पहला – Overshoot: तापमान 1.5°C से ऊपर चला जाता है।
- ➤ दूसरा – Peak: तापमान को यथासंभव कम अधिकतम स्तर (Peak) पर रोकने का प्रयास किया जाता है।
- ➤ तीसरा – Decline: ग्रीनहाउस गैसों (Greenhouse Gases) में भारी कमी और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने के माध्यम से तापमान को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश की जाती है।
UNEP के अनुसार यही वर्तमान परिस्थितियों में तापमान वृद्धि के प्रभावों को सीमित करने और भविष्य में 1.5°C के करीब लौटने का सबसे अच्छा उपलब्ध रास्ता है। रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि Peak जितना कम और Overshoot की अवधि जितनी छोटी होगी, जलवायु जोखिम उतना ही कम होगा।
केवल Net-Zero पर्याप्त नहीं होगा
जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए Net-Zero Emissions एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। इसका अर्थ है कि वातावरण में छोड़ी जाने वाली और हटाई जाने वाली ग्रीनहाउस गैसों के बीच संतुलन स्थापित करना।
लेकिन UNEP की रिपोर्ट के अनुसार यदि तापमान को 1.5°C की ओर वापस लाना है तो लंबे समय में Net-Negative Emissions की आवश्यकता पड़ सकती है। यानी वातावरण से जितना कार्बन छोड़ा जा रहा है, उससे अधिक कार्बन हटाना होगा। यहीं पर Carbon Dioxide Removal (CDR) की भूमिका सामने आती है।
Carbon Dioxide Removal क्या है?
Carbon Dioxide Removal यानी CDR ऐसी प्रक्रियाओं को कहा जाता है जिनके माध्यम से वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को हटाकर उसे पेड़ों, मिट्टी, समुद्र या तकनीकी प्रणालियों के माध्यम से लंबे समय तक संग्रहीत करने का प्रयास किया जाता है।
इसके उदाहरणों में Afforestation (बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण) तथा Direct Air Capture जैसी तकनीकें शामिल हैं।
हालांकि UNEP स्पष्ट करता है कि CDR को ग्रीनहाउस गैसों में तेजी से कटौती का विकल्प (Substitute) नहीं माना जा सकता। यदि जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) से उत्सर्जन लगातार बढ़ता रहा, तो केवल वातावरण से CO₂ हटाने के भरोसे जलवायु संकट को नियंत्रित करना बेहद कठिन होगा।
Climate Mitigation और Adaptation दोनों जरूरी
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण संदेश है कि Mitigation और Adaptation को साथ-साथ आगे बढ़ाना होगा।
- ➤ Climate Mitigation: इसका अर्थ है जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों को कम करना, जैसे कोयला, तेल और गैस से होने वाले उत्सर्जन में कमी तथा Renewable Energy को बढ़ावा देना।
- ➤ Climate Adaptation: इसका अर्थ है बदलती जलवायु के अनुसार समाज और अर्थव्यवस्था को तैयार करना। इसमें बाढ़ से सुरक्षा, जल संरक्षण, गर्मी से बचाव, जलवायु-सहनीय कृषि (Climate-Resilient Agriculture) और मजबूत आधारभूत संरचना (Infrastructure) शामिल हैं।
UNEP के अनुसार भविष्य में तापमान बढ़ने के साथ कुछ स्थानों पर Adaptation की भी सीमाएं सामने आ सकती हैं। इसलिए केवल भविष्य के प्रभावों से निपटने की तैयारी पर्याप्त नहीं होगी; उत्सर्जन में तेजी से कमी भी जरूरी है。
सबसे बड़ा खतरा: Tipping Points
तापमान के अधिक बढ़ने और लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहने से Tipping Points यानी ऐसी महत्वपूर्ण सीमाओं को पार करने का खतरा बढ़ सकता है, जिनके बाद पर्यावरणीय परिवर्तन बहुत कठिन या अपरिवर्तनीय (Irreversible) हो सकते हैं।
UNEP ने प्रमुख Ice Sheets के अस्थिर होने, Amazon Rainforest के क्षरण (Degradation) और Atlantic Meridional Overturning Circulation (AMOC) में बदलाव जैसे संभावित जोखिमों की ओर संकेत किया है। इसका अर्थ है कि तापमान को बाद में कम कर लेने पर भी सभी नुकसान अपने-आप पहले जैसी स्थिति में वापस नहीं आएंगे।
क्या तापमान घटने के बाद दुनिया फिर सामान्य हो जाएगी?
UNEP की रिपोर्ट का उत्तर है—जरूरी नहीं।
यदि भविष्य में वैश्विक तापमान फिर नीचे आता भी है, तब तक समुद्र-स्तर में वृद्धि, बर्फ की चादरों का नुकसान, जैव विविधता (Biodiversity) में कमी, पारिस्थितिक तंत्र में बदलाव और कुछ समुदायों का विस्थापन (Displacement) हो सकता है।
इसलिए तापमान को बाद में कम करने की उम्मीद वर्तमान में उत्सर्जन घटाने की आवश्यकता को समाप्त नहीं करती। इसके विपरीत, आज जितनी तेजी से कार्रवाई होगी, भविष्य का Overshoot उतना ही छोटा और कम खतरनाक बनाया जा सकेगा।
भारत के लिए इसका क्या महत्व है?
भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बढ़ता तापमान अत्यधिक गर्मी (Extreme Heat), जल संकट, कृषि उत्पादकता, बाढ़, तटीय क्षेत्रों में समुद्र-स्तर वृद्धि और स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है।
इसलिए भारत के लिए Renewable Energy का विस्तार, ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency), सार्वजनिक परिवहन, जल संरक्षण, जलवायु-सहनीय कृषि और शहरों में Heat Action Plans जैसी Adaptation रणनीतियां महत्वपूर्ण होंगी। साथ ही वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन कम करना भी जरूरी है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है।
निष्कर्ष
UNEP की Limiting Overshoot रिपोर्ट दुनिया के सामने एक कठिन लेकिन महत्वपूर्ण वास्तविकता रखती है। 1.5°C की सीमा का पार होना अब आने वाले वर्षों में संभावित दिखाई दे रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मानवता के पास कोई विकल्प नहीं बचा है।
इसके लिए जीवाश्म ईंधनों से तेजी से बदलाव, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी कटौती, Methane जैसे शक्तिशाली गैसों पर नियंत्रण, Renewable Energy का विस्तार, Adaptation और जिम्मेदारीपूर्वक Carbon Dioxide Removal—इन सभी की आवश्यकता होगी।
UNEP का संदेश स्पष्ट है: Overshoot को स्वीकार कर लेना समाधान नहीं है; उसे सीमित करना और उससे वापस लौटने की तैयारी करना ही अगली जलवायु चुनौती है। आज लिए गए निर्णय यह तय करेंगे कि आने वाली पीढ़ियों को कितनी अधिक गर्म दुनिया का सामना करना पड़ेगा।
संदर्भ (References):
UNEP - Limiting Overshoot: Navigating Exceedance
UNEP Press Release: World Set to Cross 1.5°C
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