Biochar Revolution in India
From Farm Smoke to Black Gold: The Biochar Revolution in India
(खेत के धुएं से 'ब्लैक गोल्ड' तक: भारत में बायोचार क्रांति)

जब कभी भी बायोचार (Biochar) को मिट्टी (Soils) में मिलाया जाता है, तो वो मिट्टी की पानी संचित (Store) करने की क्षमता को बढ़ाता है, जिससे सूक्ष्मजीवों (Microbes) के विकास (Growth) में काफी फायदा पहुंचता है। अध्ययन (Studies) ये बताते हैं कि फसल (Crop) की उत्पादन शक्ति को ये लगभग 10 से 30% तक बढ़ा देता है और जल संधारण क्षमता (Water Holding Capacity) 10 से 25% तक बढ़ा देता है। तो हम ये कह सकते हैं कि ये खराब (Poor) और क्षरित (Degraded) मिट्टी (Soils) के स्वास्थ्य के लिए एक अच्छा विकल्प है।

बायोचार (Biochar) क्या है?

बायोचार (Biochar) एक कार्बन से भरपूर (Carbon-rich) ठोस पदार्थ है, जो कृषि अवशेष (Crop Residue), लकड़ी, बांस, नारियल के छिलके, गोबर या अन्य जैविक पदार्थों (Organic Matter) को कम या बिना ऑक्सीजन (Oxygen) में उच्च तापमान पर गर्म करके बनाया जाता है। इस प्रक्रिया को पाइरोलिसिस (Pyrolysis) कहा जाता है।

आसान भाषा में कहें तो: Biochar एक खास तरह का चारकोल (Charcoal) है, लेकिन इसे ईंधन के लिए नहीं बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने (Improve Soil Quality), कार्बन को लंबे समय तक संग्रहित (Store) करने और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए बनाया जाता है।
How Biochar is made

बायोचार (Biochar) कैसे बनता है?

  • ➤ फसल के अवशेष (Crop Residues) जैसे धान की पराली, गेहूं का भूसा, गन्ने का कचरा आदि इकट्ठा किए जाते हैं।
  • ➤ इन्हें Pyrolysis मशीन या भट्टी में 350°C–700°C के बीच कम ऑक्सीजन में गर्म किया जाता है।
  • ➤ इस प्रक्रिया से तीन मुख्य उत्पाद (Products) मिलते हैं:
    1. Biochar (ठोस कार्बन)
    2. Bio-oil (तरल ईंधन)
    3. Syngas (ज्वलनशील गैस)

बायोचार (Biochar) की खासियत (Benefits)

  • ➤ मिट्टी में पानी रोकने (Water Retention) की क्षमता बढ़ाता है।
  • ➤ पौधों के लिए पोषक तत्वों (Nutrients) को लंबे समय तक उपलब्ध रखता है।
  • ➤ रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) की जरूरत कम कर सकता है।
  • ➤ मिट्टी में दशकों से लेकर सैकड़ों वर्षों तक कार्बन को सुरक्षित (Carbon Sequestration) रख सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) कम करने में मदद मिलती है।
  • ➤ पराली जलाने (Stubble Burning) का एक उपयोगी विकल्प है, जिससे वायु प्रदूषण (Air Pollution) कम हो सकता है।

भारत में कृषि अवशेष जलाने और मिट्टी के बिगड़ते स्वास्थ्य का संकट

भारत (India) एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ हर वर्ष करोड़ों टन कृषि अवशेष (Crop Residue) उत्पन्न होते हैं। इनमें धान की पराली, गेहूँ का भूसा, गन्ने की पत्तियाँ, मक्का के डंठल, कपास के अवशेष तथा अन्य जैविक पदार्थ शामिल हैं। अर्थात भारत में बड़ी मात्रा में बायोमास (Biomass) उत्पन्न होता है। इन अवशेषों का उचित प्रबंधन (Management) न होने के कारण किसान अक्सर उन्हें खेतों में ही जला देते हैं। इस प्रक्रिया को बायोमास दहन (Biomass Burning) कहा जाता है। यह केवल वायु प्रदूषण का कारण नहीं बनता, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य (Soil Health), कृषि उत्पादकता (Agricultural Productivity) और पर्यावरण (Environment) पर भी गहरा नकारात्मक प्रभाव डालता है।

कम फसल कटाई अवधि (Short Post-Harvest Periods) और व्यावहारिक विकल्पों की कमी (Lack of Practical Alternatives) के कारण पंजाब और हरियाणा हर साल लगभग 20 मिलियन टन (20 Million Tons) पराली (Residue or Paddy Straw) जलाते हैं।

बायोमास दहन का मृदा स्वास्थ्य (Soil Health) पर प्रभाव

1. मिट्टी के जैविक कार्बन (Organic Carbon) में कमी

मिट्टी में मौजूद जैविक कार्बन उसकी उर्वरता (Fertility) का आधार होता है। जब फसल अवशेष जलाए जाते हैं, तो उनमें मौजूद अधिकांश कार्बन वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के रूप में निकल जाता है। इससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है।

2. लाभकारी सूक्ष्मजीवों (Beneficial Microbes) का विनाश

मिट्टी में अनेक प्रकार के बैक्टीरिया, कवक (Fungi) और अन्य सूक्ष्मजीव रहते हैं, जो पोषक तत्वों के चक्र (Nutrient Cycle), जैविक पदार्थों के अपघटन (Decomposition) और पौधों की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आग की तीव्र गर्मी इन सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देती है, जिससे मिट्टी की जैविक सक्रियता घट जाती है।

3. पोषक तत्वों (Nutrients) की हानि

फसल अवशेषों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इन्हें जलाने से नाइट्रोजन और सल्फर जैसी गैसीय तत्वों का बड़ा हिस्सा वायुमंडल में उड़ जाता है। इससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता कम होती है और किसानों की उर्वरकों (Fertilizers) पर निर्भरता बढ़ जाती है।

4. मिट्टी की संरचना (Soil Structure) का बिगड़ना

लगातार बायोमास दहन से मिट्टी के कणों का प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होता है। मिट्टी की जल धारण क्षमता कम होती है, कठोर परत (Hardpan) बनने लगती है तथा जड़ों के विकास में बाधा आती है। परिणामस्वरूप फसल उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

5. केंचुओं (Earthworms) और अन्य जीवों का नुकसान

मिट्टी में रहने वाले केंचुए और अन्य छोटे जीव मिट्टी को भुरभुरा (Porous) बनाने तथा जैविक पदार्थों को विघटित (Decompose) करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आग के कारण इन जीवों की संख्या घट जाती है, जिससे मिट्टी का प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) प्रभावित होता है।

पर्यावरण पर प्रभाव (Environmental Impact)

बायोमास दहन से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड तथा सूक्ष्म कण (PM2.5 और PM10) वायुमंडल में उत्सर्जित होते हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है, स्मॉग (Smog) की स्थिति बनती है और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को भी बढ़ावा मिलता है। दिल्ली और उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान बढ़ने वाला प्रदूषण आंशिक रूप से पराली जलाने से भी जुड़ा होता है。

Solutions for Stubble Burning

समाधान (Solutions)

बायोमास दहन की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंध (Ban) लगाने से नहीं होगा, बल्कि किसानों को व्यावहारिक और लाभदायक विकल्प (Practical and Profitable Alternatives) उपलब्ध कराने होंगे:

  • ➤ फसल अवशेषों से बायोचार (Biochar) बनाना, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सके।
  • ➤ कृषि अवशेषों का उपयोग बायोगैस, बायो-सीएनजी और जैव ऊर्जा (Bioenergy) उत्पादन में करना।
  • ➤ हैप्पी सीडर (Happy Seeder), सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (Super SMS) और मल्चर (Mulcher) जैसी मशीनों का अधिक उपयोग।
  • ➤ कृषि अवशेषों से कम्पोस्ट (Compost) और जैविक खाद (Organic Manure) तैयार करना।
  • ➤ किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन (Financial Incentives) और तकनीकी सहायता प्रदान करना।
  • ➤ कृषि अवशेषों के संग्रहण, परिवहन और प्रसंस्करण (Collection, Transportation, and Processing) के लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत व्यवस्था विकसित करना।
निष्कर्ष: यहाँ तक कि जो महाराष्ट्र की काली मिट्टी (Black Soil) और केरल की लाल मिट्टी (Red Soil) की गुणवत्ता खराब होती जा रही है, उसे भी बायोचार (Biochar) के इस्तेमाल से ठीक किया जा सकता है।