कई हफ्तों (Weeks) तक रुक-रुक कर चली वार्ताओं (Negotiations) के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) अंततः ईरानी शासन (Iranian Regime) के साथ युद्ध समाप्त करने पर सहमति (Agreement) हासिल करने में सफल होते दिखाई दे रहे हैं। यह वही संघर्ष (Conflict) है जिसने फरवरी (February) के अंत से पूरे क्षेत्र, विशेषकर मध्य पूर्व (Middle East), एशिया (Asia) तथा विश्व के अनेक ऊर्जा बाज़ारों (Energy Markets) को अस्थिर (Unstable) कर रखा था。
हालांकि, वास्तव में किन शर्तों (Terms and Conditions) पर सहमति बनी है, यह तब तक विवाद (Controversy) का विषय बना रह सकता है जब तक कि शुक्रवार को इस समझौते (Agreement) पर औपचारिक हस्ताक्षर (Formal Signing) नहीं हो जाते।
कुछ प्रमुख शर्तों की चर्चा की जा रही है:
- ➤ ईरान ने जलडमरूमध्य होर्मुज़ (Strait of Hormuz) से नाकाबंदी (Blockade) हटाने पर सहमति जताई है।
- ➤ अमेरिका, ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों (Sanctions) को हटाएगा, विशेष रूप से तेल निर्यात (Oil Export) से जुड़े प्रतिबंधों को।
- ➤ ईरान परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) नहीं बनाएगा तथा संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) को पतला (Dilute) करेगा। हालांकि, इसके लिए निरीक्षण (Inspection) की व्यवस्था पर भी चर्चा हुई है।
- ➤ इज़राइल (Israel) द्वारा कब्ज़ा (Captured/Occupied) किए गए क्षेत्रों को लेकर उसके प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्रालय (Defence Ministry) ने संकेत दिया है कि वे उन्हें यथावत (Status Quo) बनाए रखेंगे। यह एक महत्वपूर्ण विषय है और समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद इसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
इज़राइली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के प्रोत्साहन (Encouragement) पर, ट्रंप ने 28 फरवरी को इस युद्ध की शुरुआत इस उद्देश्य (Objective) से की थी कि ईरानी शासन को सत्ता से हटाया जाए और तेहरान (Tehran) को झुकने पर मजबूर किया जाए, जैसा कि उन्होंने पहले वेनेज़ुएला (Venezuela) के मामले में करने का प्रयास किया था。
किन्तु ईरान (Iran) की सशक्त रक्षात्मक प्रतिक्रिया (Strong Defensive Response) के सामने वे अपने इस लक्ष्य (Goal) को प्राप्त नहीं कर सके। घरेलू (Domestic) और अंतरराष्ट्रीय (International) स्तर पर बढ़ते दबाव (Pressure) के कारण ट्रंप को अंततः उपलब्ध कूटनीतिक समाधान (Diplomatic Solution) स्वीकार करना पड़ा, ताकि संघर्ष को शीघ्र (Rapidly) समाप्त किया जा सके。
वॉशिंगटन (Washington) और तेहरान (Tehran) द्वारा घोषित हालिया “समझौता ज्ञापन” (Memorandum of Understanding - MoU) इसी वास्तविकता (Reality) की पुष्टि (Confirmation) करता है。
इस समझौते के परिणामस्वरूप (As a Result) ईरान युद्ध से पहले की तुलना में अधिक सशक्त (Stronger) स्थिति में उभर सकता है। वहीं, अमेरिका का क्षेत्र में प्रभाव (Influence) और प्रभुत्व (Dominance) कमज़ोर पड़ सकता है, जबकि इज़राइल स्वयं को अपेक्षाकृत (Relatively) अधिक अलग-थलग (Isolated) महसूस कर सकता है。
यह समझौता फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf) के अरब देशों को भी अपनी सुरक्षा रणनीतियों (Security Strategies) और अमेरिका के साथ अपने गठबंधनों (Alliances) पर पुनर्विचार (Reconsideration) करने के लिए प्रेरित कर सकता है। साथ ही, वे ईरान को क्षेत्र की एक प्रभावशाली शक्ति (Influential Regional Power) के रूप में स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं。
ईरानी वार्ता टीम के करीबी एक स्रोत के अनुसार, अंतिम 60-दिवसीय वार्ता अवधि के दौरान ईरान की जमी हुई परिसंपत्तियों (Frozen Assets) में से 24 अरब डॉलर जारी किए जा सकते हैं。
मसौदे में कथित तौर पर शामिल प्रमुख बिंदु:
- ➤ जलडमरूमध्य होर्मुज़ (Strait of Hormuz) को अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए पूरी तरह खोलना।
- ➤ ईरानी तेल निर्यात (Oil Exports) पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत।
- ➤ ईरान द्वारा परमाणु हथियार न बनाने और यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को सीमित करने की प्रतिबद्धता।
- ➤ अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण (International Inspections) की व्यवस्था पर सहमति।
- ➤ अंतिम समझौते तक 60 दिनों की अतिरिक्त वार्ता अवधि।
यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो यह मध्य पूर्व (Middle East) की शक्ति-संतुलन व्यवस्था, वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों (Global Energy Markets) और अमेरिका-ईरान संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है。
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